वरिष्ठ पत्रकार सोमदत्त शास्त्री बता रहे हैं कि मध्यप्रदेश में भाजपा अकड़ और अहंकार रूपी एंटीकंबेंसी से घिरी है तो कांग्रेस को उसके बागी ना ले डूबें

सोमदत्त शास्त्री, वरिष्ठ पत्रकार बता रहे हैं कि यह चुनाव समर अगर कांग्रेस को सदमा देने वाला साबित होगा तो नतीजों से भाजपा को भी कम झटका लगने वाला नहीं है.

पिछले पंद्रह साल में पहली बार चुनावी नतीजों को लेकर जैसा उहापोह और असमंजस है, वैसा इस राज्य में कभी नहीं देखा गया। चुनाव की शुरुआत में जिस तरह के मुद्दे हवा में उछल रहे थे, वे मतदान तक पहुंचते-पहुंचते कब, कैसे बिखर कर कहां विलीन हो गए पता ही नहीं चला। विकास और बुनियादी तरक्की, भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध, माफिया का शासन-प्रशासन पर बढ़ता दखल या व्यापमं घोटाले की बात करना तो राजनीतिक दलों ने भी लगभग बंद कर दिया है। घूम फिर कर जाति-संप्रदाय, परिवारवाद और जुमलेबाजियों के इर्द-गिर्द सिमटा रहा। यह चुनाव समर अगर कांग्रेस को सदमा देने वाला साबित होगा तो नतीजों से भाजपा को भी कम झटका लगने वाला नहीं है जो अबकी बार 200 पार के नारे के साथ मैदान में थी।

मध्यप्रदेश दिल थामकर चुनाव नतीजों की प्रतीक्षा कर रहा है । सन 2003 के बाद हुए चुनावों में यह पहला चुनाव है जब कांग्रेस ने पंद्रह साल से निरंतर सत्ता में बैठी भाजपा के सामने तगड़ी चुनौती पेश करके उसका पसीना उतार दिया है। देश के काऊ बेल्ट के बड़े राज्यों में शुमार मध्यप्रदेश का यह चुनाव भाजपा और कांग्र्रेस के अलावा अन्य सभी पार्टियों के लिए इस लिए अहम है क्योंकि इसी चुनाव के नतीजों पर 2019 के लोकसभा चुनाव की दिशा भी तय होनी है। मध्यप्रदेश में भाजपा का दावा रहा है कि, विकास नहीं करते तो पिछले तीन चुनाव कैसे जीतते? लेकिन जमीनी हकीकत यही रही है कि पिछले पंद्रह साल में पहली बार भाजपा को पसीना उतार देने वाले विरोध का सामना करना पड़ा है, विरोध सिर्फ विकास के मोर्चे पर ही नहीं है बल्कि उस अकड़ और अहंकार को लेकर भी है जो डेढ दशक तक लगातार सत्ता में बने रहने के फलस्वरूप भाजपा कार्यकर्ताओं में अनायास ही घर कर गया ।

मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक भले थोड़ी विनम्रता बरत रहे हों, लेकिन अधिकारी, कर्मचारी और नेताओं के चंगू-मंगुओं ने मुख्यमंत्री के विनम्र रहने की सीख के बावजूद जो गुल खिलाए हैं वही नाराजगी के रूप में भाजपा के सामने है। इसी नाराजगी पर काबू पाने के लिए भाजपा ने अपने बड़े नेता बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, रामकृष्ण कुसमरिया और कुसुम सिंह मेहदेले सहित कइयों के टिकट काटे थे लेकिन इनमें से कई पार्टियां बदल कर या फिर स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ खड़े हो गए। भाजपा ही नहीं कांग्रेस भी अपने बागियों को आखिरी क्षणों तक मना नहीं पाई और वे मुकाबले में बने रहे। इसका दोनों पार्टियों को कितना खामियाजा भुगतना पड़ा? यह तो नतीजों से ही पता लगेगा। बहरहाल, बागियों से ज्यादा भाजपा और कांग्रेस की जीत की आकांक्षाओं पर उन भितरघातियों ने असर डाला है जो अपनी-अपनी पार्टियों में रहते हुए उसके अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ ही वातावरण बनाने में लगे रहे हैं।

आरएसएस की जमीनी पकड़, दस से ज्यादा सर्वे के जरिए जुटाए गए फीडबैक, चुनाव के मद्देनजर आखिरी साल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा की गई अरबों रुपए के लोक लुभावन योजनाओं की घोषणाओं के बावजूद भाजपा को यह हकीकत पता है कि वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के दरमियान वोटों का फर्क केवल 8.4 फीसदी का ही था यानी सिर्फ 4.2 फीसदी वोट कबाड़ कर कांग्रेस आसानी से भाजपा की बराबरी में आ सकती है। ऐसे में भाजपा की पूरी ताकत वोट की मौजूदा हिस्सेदारी में दो से तीन फीसदी इजाफे की रही है। भाजपा ने इस बार नए मतदाता समूहों पर फोकस किया। इसके लिए ‘सरकार चलाने आन लाइन आइडिया’ मांगने, टाउनहाल प्रोग्राम के जरिए युवा मतदाताओं तक पहुंचने जैसे तमाम आयोजन किए गए। पुराने मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने के लिए लोकलुभावन घोषणाओं के अलावा ‘संबल योजना’ पिछले जून में लांच की गई, जिसमें असंगठित क्षेत्र के सवा दो करोड़ मतदाताओं तक भाजपा की सीधी पहुंच हो जाने का अनुमान है, इन्हें मातृत्व खर्च का भुगतान, बच्चों के स्कूल-कालेज की ट़्यूशन फीस, बिजली बिल बकाया माफी और 200 रुपए में कनेक्शन जैसी योजनाएं सभी वर्गों के लिए चलाई गईं।

कांगे्रस ‘साफ्ट हिंदुत्व’ पर पूरे चुनाव में जोर देती रही लेकिन कमलनाथ की कुछ कथित सीडी का हवाला देकर जिन्हें कांग्रेस फर्जी करार देती है, भाजपा ने पूरे चुनाव में सांप्रदायिक तडक़ा डालने की पूरी-पूरी कोशिश की थी। अलबत्ता नोटबंदी और जीएसटी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भाजपा ने चुप्पी साधे रहने की रणनीति अपनाई। किसान आंदोलन से भाजपा प्रभावित तो हुई है लेकिन एक वास्तविकता यह भी है कि किसान के वोट बिखरे हुए होते हैं, अमूमन किसान भी जाति आधारित खेमों में बंटे रहते हैं और उसी के अनुरूप मतदान करते हैं। भाजपा ने इस बात की लंबी प्रतीक्षा की थी कि कांग्रेस किसे अपना मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाती है। उसे उम्मीद थी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को वह मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताएगी और उसने जो कैंपेन चलाया वह ज्योतिरादित्य को ध्यान में रखकर ही ‘माफ करो महाराज हमारा नेता तो शिवराज’ के स्लोगन से चलाया गया। भाजपा शिवराज सिंह को किसान पुत्र कहती रही है और चुनाव का रुख ‘राजा, महाराजा-उद्योगपति बनाम किसान पुत्र के रूप में करती आई है।

मध्यप्रदेश की 230 सीटो को अलग-अलग क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो जुदा-जुदा मिजाज दर्शाती हैं। विंध्य-बघेलखंड के सीमांत इलाकों में जहा बसपा और समाजवादी पार्टी का भी प्रभाव रहा है, भाजपा को झटके लग सकते हैं। इस इलाके में एट्रोसिटी एक्ट, जाति समूह और एंटी इनकमबेंसी जैसे मुद्दे मुखर नजर आते रहे हैं। मालवा- निमाड़ और बुंदेलखंड में भी इस बार मिले-जुले नतीजों की उम्मीद नजर आती है। हालांकि भाजपा उम्मीद कर रही है कि भोपाल, इंदौर, गवालियर, जबलपुर, रीवा और उज्जैन की 60-70 शहरी सीटों जिनमें अधिकांश भाजपा के पास हैं, पार्टी को फिर से कामयाबी मिलेगी। महिलाओं और युवाओं के वोट उसे खुलकर हासिल होंगे। शिवराज सिंह चौहान दावा करते हैं कि वे आसानी से सरकार बनाने लायक समर्थन हासिल होंगे। उनके पास पर्याप्त सीटें हो जाएंगी। शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि वे मध्यप्रदेश को शीर्ष राज्य बनाना चाहते हैं और इसी उद्देश्य से जनादेश मांग रहे हैं। उधर कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष कमलनाथ का कहना है कि राज्य में हर तबका छला हुआ महसूस कर रहा है। वह इस बार कांग्रेस को ही चुनना पसंद करेगा। कांग्रेस ने अपना नारा दिया है ‘वक्त है बदलाव का’ क्या वाकई मध्यप्रदेश में बदलाव होगा?

इस बार चुनाव थोड़े अलग हैं। ये चुनाव सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस की ताकत के परीक्षण का अवसर तो हैं ही हैं। साथ ये चुनाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि इन चुनावों के नतीजे आने के कुछ महीनों के भीतर ही आम चुनाव का प्रचार अभियान भी जोर शोर से गतिशील होगा ।राज्यों में कांग्रेस और भाजपा ने जो “घोषणायें” की हैं और “वचन” दिए हैं, उनकी पूर्ति के लिए धन कहाँ से आएगा ? इसका रास्ता दोनों ने नहीं बताया है | सरकारें हमेशा अपना खजाना भरने के लिए जनता की जेब ही ढीली करती रही हैं | यदि भाजपा इन विधानसभा चुनावों में एक बार फिर मजबूती से उभरकर आती है तो देश में एक मजबूत विपक्षी गठबंधन तैयार करने की प्रक्रिया और कठिन हो जाएगी। इसके उलट अगर इन चुनावों में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करने में कामयाब रहती है तो भाजपा को केंद्र की सत्ता से हटाने के प्रयासों में उसकी केंद्रीय भूमिका और भी मजबूत हो जाएगी।

ऐसे में स्वाभाविक है कि मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए तमाम राजनीतिक दलों द्वारा तमाम तरह के वादे किए गये और किये जा रहे हैं और मतदाताओं को लुभाया भी जा रहा है। चिंता की बात यह है कि राजकोषीय स्थिति तंग होने के बावजूद जो वादों पर वादे किए जा रहे हैं, उनके लिए धन कहाँ से आएगा ? तमाम राजनीतिक दल खुलकर आर्थिक लोकलुभावनवाद का प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन विपक्षी दलों में यह कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है। सोचिये, प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद का यह सिलसिला आम चुनाव तक जारी रहा तो क्या परिणाम आयेंगे?

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक समीक्षक हैं. दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं)


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