ब्रेकिंग स्टोरी : 'तलाक से पहले मेरी बीवी ने कहा, 'अब किसी और लड़की की ज़िंदगी बर्बाद मत करना' मिलिए राजपरिवार के एक समलैंगिक राजा से..!

मेरे तलाक़ से पहले जब मेरी बीवी के साथ मेरा झगड़ा हो रहा था तब उसने मुझे कहा, “अब किसी और लड़की की ज़िंदगी बर्बाद मत करना.” अजीब सी बात है, लेकिन मेरी शादी में गुनहगार भी मैं था, और पीड़ित भी मैं ही था. लेकिन ये पीड़ा क्या थी क्यों थी वो समझने के लिए मैं ख़ुद असमर्थ था.

ज़ाहिर है राजकुमार की ज़िंदगी आरामदायी होती है, लेकिन महलों के आलीशान कमरों में ऐशो-आराम के साथ आपको मिलता है अकेलापन. राजसी परिवारों में ज़िंदगी जीने के नियम होते हैं, आप मर्यादा नहीं तोड़ सकते. जब चाहे तब किसी के भी पास जाकर बात नहीं कर सकते.

जैसा हर राजा-रजवाड़ों के राजकुमारों के साथ होता है वैसे मैं भी दाई मां के पास बड़ा हुआ. मैं महल में हमेशा एक बेहद ख़ूबसूरत औरत को देखता, जो हमेशा शानदार कपड़ों में सजी हुई रहती. कभी वो आके मुझसे बात भी करती. आपको ये जान कर हैरत होगी कि मुझे कई सालों तक पता नहीं था कि वो मेरी मां है. जब मेरी दाई मां ने मुझे ये बात बताई तब मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जो औरत मुझे अपनी गोद में खिलाती है, अपने हाथों से मेरे मुंह में निवाले रखती है, मुझे लोरी सुनाती है, वो मेरी असली मां है ही नहीं.

बचपन कुछ ऐसे ही बीता. जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तब मुझे लगने लगा कि मैं बाकी दोस्तों से अलग हूं.  मुझे उस उम्र में लड़कियों की बजाए लड़कों की ओर आकर्षण होता था. हां, मेरी बहुत सारी सहेलियां थी क्यूंकि मैं उनके साथ ज़्यादा कम्फर्टेबल फ़ील करता था. लेकिन लड़कों के प्रति मेरे आकर्षण को लेकर मैं सोचता रहता था कि, ये आकर्षण टेम्पररी होगा या हमेशा ऐसा ही रहेगा? मैं खुद को नॉर्मल नहीं पाता था. जो भी हो रहा था उसे लेकर मन में गिल्ट भी होता रहता था क्यूंकि मैं अपने आप को समझ नहीं पा रहा था. इस के बारे में किसी से बात करने की तो मैं सोच भी नहीं सकता था.

राजसी परिवारों में माता-पिता के साथ बहुत अंतर रहता है. बहन की तो पहले ही शादी हो चुकी थी तो उससे भी अंतर बना हुआ था. वैसे भी राजपूत सेक्शुअल मुद्दों पर कतई बात नहीं करते. ऐसे माहौल में मैने तो ग़लती से भी नहीं सोचा कि मुझे किसी के साथ बात करनी चाहिए. मैं 25 साल का था जब मेरी शादी की बात चली. शादी के लिए मुझ पर कोई दबाव नहीं था. कई राजघरानों से रिश्ते आए थे, मैंने भी कई लड़कियां देखी.

बेहद सुंदर और सुशील राजकुमारी को मैंने अपनी पत्नी बनाना चाहा. ये सब चल रहा था तब सोचा नहीं कि मुझे तो पहले कभी लड़कियों के प्रति आकर्षण ही नहीं हुआ. बल्कि मैं तो ये सोच रहा था कि शादी कर लूंगा तो सब ठीक हो जाएगा, मैं ‘नॉर्मल’ हो जाऊंगा. शादी से पहले मेरे संबंध कभी किसी लड़की से हुए ही नहीं थे. मुझे मेरी पत्नी के प्रति बिल्कुल भी शारीरिक आकर्षण नहीं होता था. वो बहुत अच्छी लड़की थी, अगर हमारी शादी नहीं हुई होती तो हम बहुत अच्छे दोस्त बन सकते थे, लेकिन शादी सिर्फ़ दोस्ती नहीं होती, आपके साथी की जाती संतुष्टि भी आपकी ही ज़िम्मेदारी होती है.

बिना कोई शारीरिक संबंध एक साल बीत गया. उसे भी फ्रस्ट्रेशन हो रहा था, और मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? रिश्तेदार और परिवार वाले उसे गुड न्यूज़ देने के लिए कहे जा रहे थे. वो उन्हें बताती तो क्या बताती. हमारे बीच में झगड़े होने लगे. हम मैरिज काउंसलर के पास भी गए. लेकिन हमारे सवाल वैसे के वैसे ही थे. मुझे लाचारी महसूस हो रही थी. मुझे औरतों के प्रति संवेदना है. ना मैं उसका दुःख देख पाता, ना उसे दूर कर पाता था. वो भी अपने आप में परेशान थी, कि इतनी सुंदर होने के बावजूद कैसे में उस से आकर्षित नहीं हूं.

वो दो बार मायके भी चली गई थी, एक-दो बार वायलेंट भी हो गई थी. आख़िर हमने तय किया कि हम तलाक़ लेंगे. माता-पिता को भी लगा कि ये मामला जम नहीं रहा है. हम पति-पत्नी के बीच जो हुआ और नहीं हुआ था उसके बारे में मैंने किसी के साथ बात नहीं की थी. क्योंकि, जब आप राजकुमार होते हैं तब आप अपनी मां का हाथ पकड़कर या पिता के साथ चाय पीते हुए यह दीदी को फ़ोन कर अपनी प्रॉब्लम्स नहीं बता सकते. हमारा डिवोर्स हुआ उसके एक साल में उसकी दूसरी शादी हो गई और मुझ पर फ़िर शादी करने का दबाव आने लगा.

अब मुझे मेरी शादी की विफ़लता का कारण ढूंढना था. लेकिन मेरी दिशा बदल रही थी. मेरी मुलाक़ात अशोक राव कवि से हुई. वो भारत के सबसे पहले समलैंगिक कार्यकर्ता थे. वो ऐसा दौर था जब मैं LGBT  के बारे में जानता था लेकिन ख़ुद के बारे में श्योर नहीं था. अशोक राव कवि सिर्फ़ मेरे गुरू ही नहीं, मेरी मां भी हैं. उन्होंने मुझे जो प्यार दिया वो मुझे मेरी मां ने कभी नहीं दिया. उन्होंने मुझे LGBT के बारे में समझाया. तब पहली बार मैं खुद को पा सका. मैंने ख़ुद को पापी मानना बंद किया. मेरे दिल से गिल्ट का बोझ चला गया. मैं अपने जैसे और लोगों से भी मिला. अशोक ने मुझे हिम्मत और प्रेरणा दी. मैंने उनके कहने पर गुजरात में लक्ष्य संस्था शुरू करके समलैंगिक पुरुषों में एचआईवी एड्स की जागरुकता लाने के लिए काम करना शुरु किया. लेकिन मेरी मुश्किलें अभी ख़त्म नहीं हुईं थी.

मुझ पर लगातार फिर शादी करने का दबाव बना रहा था. खुद की पहचान समझने का सुकून था लेकिन राजावी घरों का दबाव अलग ही होता है. मैं दोगली ज़िंदगी जी रहा था. हर क़दम पर डर रहा था. मेरे राजवी परिवार को मुझसे वारिस चाहिए था. उन के दबाव ने आखिरकार मुझे तोड़ दिया. नर्वस ब्रेकडाउन होने पर मुझे हॉस्पिटल में ले जाया गया. मुंबई के अंधेरी के मनोचिकित्सक डॉक्टर खन्ना मेरा ट्रीटमेंट कर रहे थे. मेरे परिवार को भनक थी कि मैं समलैंगिक हो सकता हूं लेकिन उन्होंने उस ख्याल तक से मुंह फ़ेर लिया था.

मनोचिकित्सक के साथ बातचीत के दौरान मैंने डरते-डरते मेरी समलैंगिकता को स्वीकारा. डॉक्टर ने पूछा कि क्या मेरे परिवार वाले ये जानते हैं? मेरी ना सुनकर उन्होंने कहा कि वो मेरा दर्द समझते हैं और मेरे माता-पिता से बात करेंगे. उन्होंने पहले सब के साथ अलग-अलग और फिर एक साथ हम सबको बिठाकर मेरी हक़ीक़त उनके सामने रखी. मेरे परिवार वालों की पहली प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थीः “इतनी सारी लड़कियों से बात करता है ये कैसे हो सकता है?”, “ये तो रोग है उसकी कोई न कोई दवा ज़रूर होगी.”, “क्या हम शॉक थिरेपी से इसे नॉर्मल बना सकते हैं?”, “जब तक ये नॉर्मल नहीं होता इसे इधर ही रखते हैं”.

डॉक्टर ने उन्हें समझाया कि अगर कोई बच्चा बाएं हाथ से लिखता है तो वो एब्नॉर्मल नहीं कहलाता. समलैंगिकता भी उतनी ही नैचुरल बात है. मेरे परिवार ने डॉक्टर को कहा कि उन्हें मेरी समलैंगिकता स्वीकार है. लेकिन वो सब सिर्फ़ एक दिखावा था. वो चाहते थे कि मैं जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी हॉस्टल से बाहर आ जाऊँ ताकि वो अपने प्लान B पे काम कर सकें.

मैं हॉस्पिटल से बाहर आया और फिर धार्मिक बाबाओं से लेकर मंत्र-तंत्र करने वालों के पास मुझे ले जाया गया. किसी ने पूजा-पाठ, मंत्र बताए, किसी ने कहा शाकाहारी बन जाओ, तो किसी ने कहा राम-राम लिखकर अपनी नोटबुक भर दो. इन सब के बाद भी मैं नहीं बदला. जब धर्म के ये पैंतरे नहीं चले तो परिवार वालों ने मुझे धमकाना शुरू किया. वो कहते कि हम तुम्हारे बारे में सब को बता देंगे. कोई तुम से बात नहीं करेगा. तुम अकेले हो जाओगे.

आख़िर मैंने वो किया जिसने मेरी ज़िंदगी बदल दी. 14 मार्च 2006 के दिन मैंने एक अखबार में अपनी समलैंगिकता का स्वीकार किया. मैंने सोचा था अगर सब को पता चल जाएगा तो ये लोग मुझे क्या कहकर डराएंगे. जैसे ही मेरा सच दुनिया के सामने बाहर आया मेरा बहुत विरोध किया गया. मुझे सिर्फ़ नफ़रत मिली. राजपीपला में मेरे पुतले जलाए गए. राजपूतों ने मेरा बहिष्कार किया. मेरे माता-पिता ने मुझे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया. इतना सब होने के बावजूद मेरा मन शांत था, क्योंकि आखिरकार मैं घुटन भरी, दोगली और झूठी ज़िंदगी से अपने आप को स्वतंत्र कर चुका था. हां, डर तब भी था लेकिन प्रामाणिक ज़िंदगी से बेहतर कुछ नहीं होता.

मेरी इस लड़ाई में मेरे साथ अशोक राव कवि के अलावा मेरी संस्था के ट्रस्टी सिलवेस्टर मर्चेंट, स्वर्गीय जयेन्द्र त्रिवेदी जिन्हें में मेरे गॉडफादर मानता हूं हमेशा मेरा साथ रहे. मेरी समलैंगिकता के बारे में दुनिया को बताना मेरे ही मेरी बग़ावत थी.

अभी कुछ समय पहले ही 377 की धारा को निरस्त किया गया है. अब समलैंगिक होना कोई गुनाह नहीं है.  जब सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया, ये डिक्लेयर किया तब मुझे लगा कि हमारे लिए एक युद्ध ख़त्म हुआ है और सामाजिक स्वीकार का दूसरा युद्ध शुरू.

जब मैं अपनी ज़िंदगी के बारे में सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरी ज़िंदगी के सभी अनुभव- चाहे वो मेरी  शादी हो, मेरे परिवार का असंवेदनशील रुख़ हो, मेरा नर्वस ब्रेकडाउन हो, खुद की समलैंगिकता के बारे में पहला इंटरव्यू हो या ओप्र्हा विनफ़्रे के शो का निमंत्रण हो, सब एक परिवर्तनशील सीमाचिह्न रहा है. मैं गीता के उपदेश को मानता हूं. हमें अपना कर्म करना चाहिए, फल के बारे में नहीं सोचना चाहिए. एक वो भी वक़्त था जब मैं सोचता था कि, “मेरे साथ ही ऐसा क्यूं होता है?” लेकिन जबसे सच जीना शुरू किया तब से उस सवाल ने मुझे फिर कभी परेशान नहीं किया. मैं उन सभी शक्तिओं का आभारी हूं जिन्होंने मेरी इस लड़ाई में मेरा साथ दिया. समलैंगिकता और समलैंगिको को लेकर बहुत सारी ग़ैरमान्यताएं हैं. आशा है कि समाज की मानसिकता बदलेगी और शिखंड़ी की बाणशैय्या का अंत आएगा.

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