इमरान सिद्ध करें कि वे फौज के मुखौटा नहीं, पाकिस्तान मे नई सरकार के बाद भारत


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

पाकिस्तान में अब वही होगा, जो फौज चाहेगी। इमरान की जीत फौज की जीत है। अपना वोट डालते वक्त पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्तान की जनता को दो-टूक संदेश दे दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के दुश्मनों को हराओ।

पाकिस्तान तहरीके-इंसाफ के नेता इमरान खान अब प्रधानमंत्री बनेंगे, इसमें जरा भी शक नहीं रह गया है। उन्हें स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है लेकिन कई छोटी-मोटी पार्टियां और निर्दलीय उम्मीदवार उन्हें समर्थन देने के लिए बेताब हैं। नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग और बिलावल भुट्टो की पीपल्स पार्टी को इतनी करारी शिकस्त मिली है और वे इस कदर बौखलाई हुई हैं कि वे अब इमरान खान को छूने के लिए भी तैयार नहीं हैं। ये दोनों पार्टियां मिलकर भी इमरान की पार्टी से बहुत कम हैं। यह तो ठीक है कि तहरीके-इंसाफ केंद्र में राज करेगी लेकिन उसे खैबर-पख्तूनख्वाह के अलावा किसी भी प्रांत में बहुमत नहीं मिला है। पंजाब में नवाज की लीग, सिंध में बिलावल और बलूचिस्तान में स्थानीय पार्टियां सबसे आगे हैं। इसका अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह है कि अपने बनने के 71 साल बाद भी पाकिस्तान राजनीतिक दृष्टि से चार हिस्सों में बंटा हुआ है। लेकिन पाकिस्तान की सेना ही वह एक मात्र ताकत है, जो इन चारों प्रांतों को एक सूत्र में बांधकर रखती है।

पाकिस्तान में अब वही होगा, जो फौज चाहेगी। इमरान की जीत फौज की जीत है। अपना वोट डालते वक्त पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्तान की जनता को दो-टूक संदेश दे दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के दुश्मनों को हराओ। कौन है, पाकिस्तान का दुश्मन उनकी नजर में ? नवाज शरीफ ! जो मोदी का यार है, वह गद्दार है। इसी नवाज को, जो कभी प्रचंड बहुमत से जीतकर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना था, पहले अदालत ने भ्रष्टाचार के मामले में फंसाकर अपदस्थ कर दिया और फिर जेल में डाल दिया। नवाज की पार्टी किसी भी हालत में जीत न पाए, सेना ने इसका पूरा इंतजाम कर डाला। उनकी पार्टी के कई महत्वपूर्ण नेताओं का दल-बदल करवाया और लगभग डेढ़ सौ निर्दलीय उम्मीदवार खड़े करवा दिए। टीवी चैनलों और अखबारों के टेंटुए कस दिए गए।

इमरान को तो जीतना ही था लेकिन पाकिस्तान की फौज राजनीति की भी उस्ताद है। उसने इमरान को इतने बहुमत से नहीं जीतने दिया, जितने से नवाज शरीफ जीते थे। इमरान कहीं नवाज न बन जाएं, बेनजीर न बन जाएं, जुल्फिकार अली भुट्टो न बन जाएं और कहीं ऐसा न हो कि वे असली ताकत आजमाने लगें। खुद ही विदेश नीति और फौज को भी चलाने का दम भरने लगें। यदि ऐसा हुआ तो फौज को वहीं पैंतरे अपनाने पड़ेंगे, जो उसने उक्त पिछले तीनों प्रधानमंत्रियों के खिलाफ अपनाए थे।

जहां तक इमरान खान का सवाल है, वे कभी सत्ता में नहीं रहे। इसीलिए यह भविष्यवाणी करना आसान नहीं है कि फौज के साथ उनके संबंध कैसे रहेंगे ? वे पारंपरिक राजनेता भी नहीं रहे। 22 साल पहले वे राजनीति में आए। उसके पहले ही वे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके थे, क्रिकेट खिलाड़ी के तौर पर ! उनका अहंकार या स्वाभिमान पहले से आसमान छूता रहा है। पिछले 22 साल में उन्होंने किसी को नहीं बख्शा है। अब वे फौज की हां में हां कब तक मिला पाएंगे, कहना कठिन है। चुनाव-अभियान के दौरान उन्होंने उसी तरह की जुमलेबाजी की, जिससे फौज की बाछें खिल जाएं लेकिन चुनाव-परिणाम आने के बाद उन्होंने भारत से संबंध-सुधार और कश्मीर के बारे में जिन सधे हुए शब्दों का प्रयोग किया, उनमें नवाज शरीफ और आसिफ जरदारी की ध्वनि आ रही थी। भला, उसे फौज कब तक बर्दाश्त करेगी ? इमरान को यह सिद्ध करना पड़ेगा कि वे फौज के मुखौटा नहीं हैं।

इसमें शक नहीं कि बेनजीर भुट्टो, आसिफ जरदारी और नवाज शरीफ भी भारत से संबंध सुधारना चाहते थे। इन तीनों नेताअेां और इमरान खान से भी मेरी कई बार घंटों बातचीत हुई है लेकिन मैंने हर बार महसूस किया है कि ज्यों ही भारत का सवाल उठता है फौज के आगे ये नेता बेबस हो जाते हैं। उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि पाकिस्तान की जनता भी यही मानकर चलती है कि सिर्फ फौज ही उसे भारत से बचा सकती है। भारत का डर पाकिस्तान की रगों में दौड़ रहा है। जब तक यह नकली डर दूर नहीं होगा, न तो कोई भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री वास्तविक प्रधानमंत्री बन सकता है और न ही भारत-पाक संबंध सहज हो सकते हैं। क्या इमरान खान इस दुष्चक्र को तोड़ पाएंगे ? अगर वे तोड़ पाए तो वे वास्तव में ‘नया पाकिस्तान’ खड़ा कर सकते हैं।

पाकिस्तान की आम जनता आतंकवाद के बिल्कुल खिलाफ है। जितने लोग भारत और अफगानिस्तान में आतंक की बलि चढ़ते हैं, उससे कहीं ज्यादा पाकिस्तान में चढ़ते हैं। अभी इन चुनावों में ही लगभग 200 लोग मारे गए। मियां की जूती मियां के सिर ही पड़ती है, इस बात को पाकिस्तान के लोग अच्छी तरह से समझते हैं। इसीलिए फौज और चुनाव आयोग की मिलीभगत के कारण प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के भी लगभग 460 उम्मीदवार खड़े हो गए लेकिन क्या हुआ ? उनमें से एक भी नहीं जीत पाया। इमरान खान जब तक फौज को नाराज करने के लिए तैयार नहीं होंगे, इन आतंकियों को काबू कैसे करेंगे ? भारत और अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकियों की पीठ कौन ठोकता है, यह सबको पता है।

एक तरफ फौज और इमरान के भावी समीकरणों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, दूसरी तरफ पाकिस्तान की लगभग सभी प्रमुख विरोधी पार्टियां एकजुट होकर इन चुनाव-परिणामों का वैसा ही विरोध कर रही हैं, जैसा कि 2013 में स्वयं इमरान ने किया था। यदि इमरान ने जोड़-तोड़ करके पंजाब प्रांत में अपनी सरकार बना भी ली तो भी अब उन्हें कई छोटे-मोटे राजनीतिक भूकंपों को झेलने के लिए तैयार रहना होगा। भुट्टो की पीपल्स पार्टी और नवाज की मुस्लिम लीग उनकी सरकार का जीना हराम कर देंगे। रावलपिंडी में फौज के मुख्यालय पर जनता के प्रदर्शन की बात तो पहली बार सुनी गई। बलूचिस्तान के लोगों के दिल में फौज के खिलाफ पहले से गहरी गांठ पड़ी हुई है। मुझे तो यह लगता है कि अब पाकिस्तान कहीं अस्थिरता और हिंसा के एक नए दौर में प्रवेश न कर जाए।

जहां तक भारत का सवाल है, वह पाकिस्तान की अंदरुनी राजनीति में क्यों उलझे ? उसे इमरान का स्वागत ही करना चाहिए, जैसा कि चीन ने किया है। इमरान जितनी बार भारत आए हैं और यहां उनके जितने मित्र और प्रशंसक हैं, उतने किसी भी पाकिस्तानी नेता के नहीं रहे हैं। इमरान ने भी भारत के साथ रिश्तों का एक नया अध्याय खोलने की बात कही है। भारत सरकार सीधे ही और उनके मित्रों के जरिए भी इमरान से बात का तार जोड़ सकती है और इमरान के जरिए वह पाकिस्तान की फौज से भी संवाद कायम कर सकती है। अपनी चुनावी चिंता के बावजूद मोदी सरकार यदि यह पहल कर सके तो कोई आश्चर्य नहीं कि दक्षिण एशिया को खाए जा रही यह 71 साल पुरानी प्रेत-बाधा दूर हो जाए।

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