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जिंदा पिता की जगह मरे हुए पिता ज्यादा साथ रहते हैं

जिंदा पिता की जगह मरे हुए पिता ज्यादा साथ रहते हैं
बारिश के बाद बारिश की याद आती है , गिरते पानी को तो कई लोग हैं जो गाली भी देते हैं …

मैंने जब भी देखा है अपने पिता को सुबह दफ्तर जाते हुए शाम को दफ्तर से वापस आते हुए ….
मेरे सवालों का जवाब देते हुए , मेरे लिए किताबें लाते हुए
तोहफों का अम्बार लगाने वाला आदमी
मेरे लिए पिता सच में एक एटीएम थे
वो भी तब जब बैंक कम हुआ करते थे
उनको सरकारी तनखाह २ तारीख को मिलती थी
और हमारा घर मात्र तनखाह पर चलता था
ये तब मुझे नहीं पता था , अब पता है

मेरे लिए पिता डर का पर्यायवाची शब्द था
जिसके घर में मौजूद होने पर खामोशी का
एक अजब भूत नाच होता था
जो धीरे धीरे …..कम होता गया ….जैसे जैसे
मैं बड़ा होता गया मुझे भूतों से डर लगना बंद हो गया
पिता का डर समाप्त हो गया और उसके बाद फिर
उनसे डरने की एक्टिंग चालू हुई ….
मैं अपने पिता की कभी इज्ज़त नहीं कर पाया
या तो डरता रहा , या फिर डरने की एक्टिंग करता रहा
प्यार भी उनसे नहीं उनके लाये तोहफों से ही रहा
इस बात का अब अफ़सोस होना चाहिए
पर न जाने क्यूँ होता नहीं है ……

अब सिर्फ एक अजब सा गुस्सा है
मुझे जिस वक़्त उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी
उस वक़्त उनकी मौत हुई ….

मुझे जिस वक़्त चाहिए था ये कहना अपने दोस्तों से
कि घर पर पापा हैं मैं शराब पी कर नहीं जा सकता
वो उस वक़्त घर पर नहीं थे
मुझे कभी डर नहीं लगा
चौराहे पर सिगरेट पीने में
या रात को घर लेट जाने में
पिता के जाने के बाद घर से
डर चला गया या मन से
ये आज तक कन्फर्म नहीं है

मुझे मेरे पिता ने कभी दाढ़ी बनाते नहीं देखा
मुझे लगता है हर लड़का ये चाहता है
के उसका पिता जाने वो दाढ़ी बनाने लगा
मुझे मेरे पिता ने कभी प्यार में पड़े हुए नहीं देखा
मुझे कभी वो रोमांच महसूस ही नहीं हुआ जो
घर पर प्रेम प्रकरण छुपाने पर होता है
मैं अपनी माँ को हर बात बताता था
मुझे तो आज तक ये भी कन्फर्म नहीं हुआ है
पिता के बाद में
मैं माँ के लिए समय की धूप में छाता था
या माँ मेरे लिए ….

पर इतना ज़रूर कन्फर्म है ये जो
कविता जैसा कुछ लिखता हूँ मैं
ये पिता की मौत का एक लम्बा
छन है जिसे जीता हूँ मैं ….
पिता की मौत हो गयी थी और
मुझे उनको जिंदा रखना था ..

कविता उनको जिंदा रखना है

जिंदा पिता की जगह मरे हुए पिता ज्यादा साथ रहते हैं।

कवि:- मानस भारद्वाज

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