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मानवता नहीं मरा करती है….

दुनिया के हर इंसान के ह्रदय में होती है मानवता, जो उसे सद्कर्म के लिए प्रेरित करते रहती है। जब भी ऐसा कोई समय आता है, जब हम किसी को तकलीफ में देखते है और उसकी मदद करना चाहते है,चाहे हम उसे जानते हो या नही… इसे ही हम मानवता कहते है। उस वक्त जो हमारे मन में मनुष्य होने के नाते दूसरे मनुष्य की मदद करने का भाव जागृत होता है वहीं मानवता कहलाती है। देश इस समय बड़े ही कठिन दौर से गुजर रहा है। जो सक्षम है वह आराम से इस लाॅकडाउन में अपने घरो में बैठे टीवी पर फिल्में देखते अपना समय गुजार रहे है। लेकिन जो रोज कमाने और रोज खाने वाले है उनके लिए ये समय एक भयावह स्थिति है, जहां उसे मालूम ही नही है कि उसे कैसे अपने परिवार का पेट पालना है,कल उसे खाना मिलेगा कि नहीं? या ये वक्त कब तक रहेगा? एैसी कई घटनाएं हमारे आस-पास होते रहती है जिसको देख कर हमे एैसा लगने लगता है कि मानवता जैसा कोई भाव है भी या नही? लेकिन इन सब के बावजूद कोरोना वायरस के इस आपातकाल में समाज के किसी कोने में छिप सी गई मानवता एक बार फिर सामने नजर आने लगी है। ये देख कर अच्छा लगता है कि लोग सिर्फ अपने लिए ही नही बल्कि दूसरो के लिए भी सोचते है,उनकी मदद को आगे आते है। देश के हर हिस्से से अब ये तस्वीर सामने आने लगी है कि लोगो ने किस तरह दूसरो के दर्द को समझ कर उनकी मदद की और उनके खाने पीने की व्यवस्था की। आपातकाल के इस दौर में कई सामाजिक संगठन, व्यापारिक प्रतिष्ठान, काॅरपोरेट घराने सामने आए है जिन्होने न सिर्फ आम लोगो के लिए भोजन की व्यवस्था की है बल्कि देश के आपातकालिक फंड में भी जमकर अपना योगदान दिया है। कई एैसे परिवार है जो इस मुश्किल की घड़ी में दिन-रात न देखते हुए एक दूसरे की मदद कर रहे है। जिस पुलिस को देख कर आम इंसान भय महसूस करता था आज उसकी मानव जाति के प्रति सेवा को देख कर उसका सम्मान कर रहा है। आज के मनुष्य में भी वहीं भाव है जो अनजान लोगो की तकलीफ को समझ कर उसकी मदद करना चाहता है।जीवन के आपाधापी में लगने लगा था कि मानवता खत्म होते जा रही है, लेकिन देश-दुनिया के इस आपातकाल ने ये साफ कर दिया कि मानवता कहीं छुपि हुई जरूर हो सकती है लेकिन मर कभी नहीं सकती। – उमेश बंसी प्रबंध संपादक

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