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रोका-छेका अभियान : योजना के रूप में मिला पारंपरिक प्रथा को पुनर्जीवन

रायपुर. राज्य में एक जुलाई से रोका-छेका अभियान शुरू हो रहा है. प्रदेश में फसलों की सुरक्षा, किसानों की आय में वृद्धि और मवेशियों को सड़कों से दूर सुरक्षित रखने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ सरकार ने ग्रामीणों और किसानों के सहयोग से रोका छेका अभियान की शुरुआत की है. इस अभियान का मुख्य लक्ष्य आवारा पशुओं से फसल को बचाना है.इसके साथ ही अभियान में वर्षा ऋतु के दौरान पशुओं को होने वाली गलघोटू और एकटंगीया आदि बीमारियों से बचाने के इंतेजाम भी इस दौरान किए जा रहे हैं.

पिछले 3 साल से रोका छेका अभियान का प्रत्यक्ष लाभ प्रदेश के किसानों को मिल रहा है पशुओं को रखने के उचित प्रबंधन से पशु खेतों में नहीं आ पा रहे हैं, जिससे फसलों का नुकसान नहीं हो रहा है. पशुओं के रखरखाव से जहां पशुओं की बीमारियां कम हो रही हैं वहीं दुग्ध उत्पादन बढ़ा है. पशुओं के स्वास्थ्य में भी सुधार हो रहा है.सड़कों पर पशुओं के न आ पाने से दुर्घटना में कमी आयी है.

छत्तीसगढ़ में रोका-छेका की पुरानी परंपरा रही है, जिसमें ग्रामीण आपसी समन्वय से फसलों की सुरक्षा के लिए पशुओं के रख-रखाव का प्रबंधन करते रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ दशकों में खेती में मशीनीकरण के फलस्वरूप किसानी में पशुधन अनार्थिक हो रहे थे, ज्यादातर पशुपालक अपने अपने पशुओं को सडकों पर आवारा छोड़ देते थे. इस समस्या के निदान की पहल करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने रोका-छेका अभियान को जनसहयोग से पुनर्जीवित किया.

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार लगातार छत्तीसगढ़ की परम्परा एवं लोक रीतियों के संवर्द्धन और संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ा रही है. सुराजी गांव योजना के तहत मुख्यमंत्री ने गांवों में अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की ओर कई महत्वपूर्ण कदम बढ़ाएं हैं. इसी क्रम में नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना के जरिए ग्रामीण व्यवस्था की नींव को पुनः मजबूत बनाया गया. किसानों को खेती के लिए इनपुट सब्सिडी भी दी जा रही है. गोबर खरीदी योजना का लाभ भी सीधे पशुपालको को मिला है, अब हर गांव में गौठानों को पूर्ण रूप से सक्रिय किया जा रहा है और यहां महिलाओं को समूह के माध्यम से जोड़कर गोबर से वर्मी कम्पोस्ट समेत अन्य उत्पादन किए जा रहे हैं. गौठानों में आयमूलक गतिविधियां भी संचालित की जा रही है. परिणामस्वरूप गांवों में स्थानीय रोजगार के साधन बढ़े हैं, शहरों की ओर पलायन थमा है और समृद्धि आई है.

पशुधन का संवर्द्धन और संरक्षण

छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य होने की वजह से यहां पशुपालको की संख्या भी अधिक है. पशुपालकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पशुओं के उचित देखरेख की थी. उचित प्रबंधन के अभाव में पशुपालन के क्षेत्र में लोगों की रुचि भी घट रही थी जिनके पास पशु होते थे वे इन्हें आवारा छोड़ देते थे लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों से अब परिस्थितियां बदल रही हैं, पशुधन अनार्थिक नहीं रहे. गोबर खरीदी, खाद निर्माण, गौठानों के बन जाने से राज्य में पशुधन की संख्या बढ़ी है. नवाचारी योजनाओं से अब पशुपालन की चुनौती कम हुई है, उन्हें अब गोबर खरीदी का प्रत्यक्ष लाभ मिला है. रोका-छेका अभियान से पशुओं को नियंत्रित रखा जा रहा है जिससे सड़क में दुर्घटना की संभावना और खेतों में फसल का नुकसान कम हुआ है.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर गांवों में गौठानों में आवारा पशुओं को रखा जा रहा है, यहां पर्याप्त चारा, पैरा आदि की व्यवस्था करने के साथ-साथ ग्रीष्मकालीन धान की फसल के पैरादान के लिए कृषकों को प्रेरित करने की पहल भी की गई, गौठानों में चारागाह की स्थापना भी की जा रही है. यहां चारा का उत्पादन भी किया जा रहा है. रोका-छेका अभियान में स्थानीय एवं ग्रामीणों जनों की मदद से खेती को सुरक्षित रखने की कवायद को सफलता मिल रही है. यह खेती किसानी को मजबूत करने की दिशा में शुभ संकेत है.

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