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विजय दिवस : जब कारगिल में पाक घुसपैठियों को भारतीय सैनिकों ने धूल चटाई, उस साल की सम्पूर्ण गाथा..

विजय दिवस : जब कारगिल में पाक घुसपैठियों को भारतीय सैनिकों ने धूल चटाई, उस साल की सम्पूर्ण गाथा..

26 जुलाई भारतीय सैनिकों का दिन है,क्योंकि यह कारगिल युद्ध के दौरान शहीदों की वीरता को बयां करता है। 90 के दशक का यह वह दौर था और था जब भारत और पाकिस्तान आपसी सौहार्द की पटरी पर आ रहे थे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे नवाज शरीफ और भारत के प्रधानमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी । अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि भारत तमाम गिले-शिकवे भुलाकर पड़ोसियों से अच्छे संबंध स्थापित करें।1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अमन और भाईचारे का पैगाम लेकर लाहौर रवाना हुए, लेकिन पाकिस्तान को हमेशा की तरह भारत के भाईचारे का यह संदेश रास नहीं आया। एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी दोस्ती की इबारत लिख रहे थे तो दूसरी तरफ पाकिस्तान कारगिल जंग की तैयारी पूरी कर चुका था।लाइन ऑफ कंट्रोल के पास कारगिल सेक्टर में आतंकवादियों के भेष में पाकिस्तानी सेना कई भारतीय चोटियों पर कब्जा कर चुकी थी। लेकिन जैसे ही भारतीय सैनिकों को इसकी खबर हुई तो हमारे भारतीय जांबाज सैनिकों ने पाकिस्तान को मुंह तोड़ जवाब दिया।

भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव किसी से छिपा नहीं है. यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान के बीच समय-समय पर युद्ध देखने को मिलते रहते हैं, इसका सबूत 1947, 1965 और 1971 के युद्ध देते हैं। सारे युद्ध एक तरफ और कारगिल युद्ध एक तरफ क्योंकि इस युद्ध से भारत ने दुनिया में अपनी ताकत का लोहा मनवाया था।26 जुलाई 1999 को भारत ने कारगिल युद्ध में विजय हासिल की। इस दिन को हर साल कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। करीब 2 महीने तक चला कारगिल युद्ध भारतीय सेना के साहस और जांबाजी का ऐसा उदाहरण है जिस पर पूरे राष्ट्र को गर्व है। लगभग 18000 फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई कारगिल की इस जंग में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी फौज को हराकर वीरता की एक नई मिसाल कायम की।

कारगिल एक निर्जन पहाड़ी इलाका। जहां आबादी शून्य के बराबर है, 6 महीने बर्फ से पूरी तरह ढका होता है और केवल 6 महीने ही आवागमन संभव होता है। लेकिन इतना जटिल क्षेत्र होने के बावजूद सामरिक नजरिए से भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण क्योंकि श्रीनगर से लेह को जोड़ने वाला श्रीनगर-लेह राजमार्ग 1A वहां से गुजरता है। अगर कोई दुश्मन चोटियों पर कब्जा कर लेता है तो राजमार्ग 1A पूरी तरह प्रभावित होता है और देश का संपर्क लेह से कट सकता है।इसके अलावा कारगिल ऐसे स्थान पर स्थित है जो 4 घाटियों का प्रवेश द्वार है। इसी के चलते पाकिस्तानी सेना लद्दाख में घुसने के लिए सबसे पहले कारगिल को अपना निशाना बनाती है।1999 से पहले 1948, 1965 और 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने इस क्षेत्र में कब्जा जमाने का असफल प्रयास किया। सामरिक नजरिए से कारगिल कश्मीर घाटी, लद्दाख और सियाचिन ग्लेशियर पर हमारी सैन्य स्थिति और सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। 1999 में इस क्षेत्र में पाकिस्तान ने एक सुनिश्चित योजना के तहत घुसपैठ की।

पाकिस्तान ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ कर जम्मू कश्मीर पर कब्जा जमाने के अपने इस अभियान को ऑपरेशन बदला नाम दिया। हालांकि पाकिस्तान ने अपनी घुसपैठ की योजना अक्टूबर 1998 में ही बना ली थी। और इसी के तहत अक्टूबर 1998 में तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के उत्तरी इलाकों का दौरा किया।

इस योजना के तहत पाक समर्थित घुसपैठिए और सैनिक 1999 के अप्रैल और मई महीने के पहले सप्ताह तक कारगिल क्षेत्र की नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय क्षेत्र में दाखिल हो चुके थे। सबसे पहले भारतीय सेना की एक गश्ती टुकड़ी की नजर उन घुसपैठियों पर पड़ी। इसके बाद सेना ने घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए अपना एक गश्ती दल भेजा लेकिन उसे काफी क्षति उठानी पड़ी।

घुसपैठियों ने पाकिस्तानी सेना के सहयोग से 9 मई 1999 को कारगिल शहर के बाहर सेना के मुख्य आयुध भंडार को नष्ट कर दिया। इसके साथ ही पाकिस्तानी सेना ने भारतीय चौकियों पर गोलीबारी शुरू कर दी। यह घुसपैठियो को आगे बढ़ाने और प्रोत्साहित करने की रणनीति का हिस्सा था।

घुसपैठियों की संख्या और फैलाव को देखते हुए भारतीय सेना ने 14 मई 1999 को ऑपरेशन फ्लश शुरू किया। हालात की गंभीरता को देखते हुए भारतीय वायु सेना भी इस अभियान में शामिल हुई। उधर भारतीय नेवी ने पाकिस्तान के खिलाफ अपने युद्धपोत अरब सागर में तैनात कर लिए, जिसके चलते पाकिस्तानी नेवी और कराची में पाकिस्तानी जहाज सक्रिय नहीं हो पाए।

इस युद्ध के दौरान भारतीय थल सेना ने अपने ऑपरेशन को ऑपरेशन विजय जल सेना ने ऑपरेशन सफेद सागर और वायु सेना ने ऑपरेशन तलवार का नाम दिया। करीब 2 महीने तक यह युद्ध चला और जुलाई के अंतिम सप्ताह में जाकर समाप्त हुआ। पाकिस्तान ने इस युद्ध में आतंकवादियों का खूब इस्तेमाल भी किया।

भारत ने पाकिस्तान को युद्ध के दौरान ही कड़ा संदेश दे दिया था कि जब तक कश्मीर की नियंत्रण रेखा से अपनी सेना पूरी तरह से वापस नहीं बुलाता उससे कोई बातचीत नहीं होगी। पाकिस्तान पर उसकी इस नापाक हरकत के लिए अमेरिका सहित दुनिया के दूसरे देशों का दबाव भी बढ़ने लगा। अमेरिका ने युद्ध के दौरान पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया कि अगर वह युद्ध को और बढ़ाता है, और अपनी सेना पीछे नहीं हटाता है तो अमेरिका भारत को सीधे समर्थन दे सकता है।

पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की पूरी कोशिश की लेकिन उन्हें कहीं से भी कोई समर्थन नहीं मिला। इस बीच भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस और वीरता दिखाते हुए 5 जुलाई को टाइगर हिल्स के पश्चिम के पॉइंट 4875 पर कब्जा कर लिया। इसके बाद द्रास और बाल्टिक क्षेत्र पर भी अपना कब्जा कर लिया।

भारतीय सेना के साहस के आगे पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए और 10 जुलाई 1999 से पाकिस्तानी सेना नियंत्रण रेखा से पीछे हटने लगी। 14 जुलाई 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऑपरेशन विजय की जीत की घोषणा की। 26 जुलाई 1999 तक भारतीय सेना ने सभी पाकिस्तानी घुसपैठियों और सेना को भारतीय सीमा से बाहर कर दिया और अटल बिहारी वाजपेयी ने इस दिन को विजय दिवस के तौर पर मनाने का आह्वान किया।

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