
नई दिल्ली। 31 वर्षीय हरीश राणा के माता-पिता की दर्दनाक कहानी ने देशभर को भावुक कर दिया है। कभी इंजीनियरिंग कॉलेज के टॉपर रहे हरीश राणा एक भयानक हादसे के बाद पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर पड़े हैं। उनकी हालत ऐसी हो गई थी कि वे जिंदा होते हुए भी मरणासन्न अवस्था में जीवन गुजार रहे थे। बेटे की लगातार पीड़ा को देखते हुए उनके माता-पिता ने लंबे समय से इच्छा मृत्यु की मांग की थी।
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए उनकी अर्जी को मंजूरी दे दी। यह निर्णय जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में 2018 के ‘कॉमन कॉज’ मामले में दिए गए निर्णय और 2023 में उसमें किए गए संशोधन का हवाला दिया, जिसमें गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है।
हरीश के पिता ने बताया कि यह फैसला उनके लिए बेहद पीड़ादायक है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने बेटे को बड़े प्यार और मेहनत से पाला-पोसा, उसे इंजीनियर बनाया और उसके उज्ज्वल भविष्य के सपने देखे थे। लेकिन हादसे के बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। अब यह फैसला उनके बेटे को असहनीय दर्द और कष्ट से मुक्ति दिलाने का एकमात्र रास्ता बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को इच्छा मृत्यु और गरिमा के साथ जीवन समाप्त करने के अधिकार से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।






