आज भ्रमण पर निकलेंगी दंतेश्वरी भवानी, दंतेवाड़ा शक्तिपीठ की 610 साल पुरानी परंपरा

मां भगवती के 52 शक्तिपीठों में से एक दंतेश्वरी भवानी की आज दुर्गाष्टमी के अवसर पर भव्य शोभायात्रा निकलेगी. मां भगवती अपने एक हजार साल पुराने मंदिर से निकलकर रथ पर सवार होंगी और नगर भ्रमण करेंगी. माता का यह मंदिर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में है. कहा जाता है कि यहां माता के दांत गिरे थे. इसलिए भवानी का नाम भी दंतेश्वरी पड़ गया. आमतौर पर मंदिरों में माता के दो ही नवरात्रे मनाए जाते हैं, लेकिन शंखनी-डंकनी नदी के तट पर स्थित इस मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र के अलावा फाल्गुन नवरात्रों पर भी मेला लगता है. इसे फागुन मड़ई कहते हैं.

वैसे तो आदिकाल से ही बस्तर के लोग मां दंतेश्वरी को कुल देवी मानते आ रहे हैं. यहां लोग कोई भी विधान माता की अनुमति के बिना नहीं करते. लेकिन बस्तर के अलावा आंध्र प्रदेश पर तेलंगाना में भी माता की काफी मान्यता है. मंदिर के प्रधान पुजारी हरेंद्रनाथ जिया पौराणिक मान्यताओं के हवाले से बताते हैं कि विष्णु भगवान के सुदर्शन चक्र से कटकर माता सती के शरीर को 52 हिस्से हो गए, जो अलग अलग स्थानों पर गिरे थे. इनमें से माता के दांत दंतेवाड़ा में गिरे. इसलिए इस स्थान और मंदिर का नाम पड़ा.

उन्होंने बताया कि बस्तर दशहरा पर्व में शामिल होने के लिए बस्तर राज परिवार के सदस्य हर साल शारदीय नवरात्र की पंचमी पर माता को न्यौता देने आते हैं. इस बार भी राजपरिवार ने पंचमी के दिन विधिवत माता का पूजन कर उन्हें दशहरा मेले में आने का न्यौता दिया है. अष्टमी पर माता अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए छत्र और डोली के साथ निकलेंगी. इस दौरन जगह-जगह उनका स्वागत और पूजन किया जाएगा.

इस मंदिर की एक खासियत ये भी है कि यहां दशहरे पर माता बस्तर दशहरा में शामिल होने मंदिर से बाहर निकलतीं हैं। बस्तर दशहरा में रावण का दहन नहीं बल्कि रथ की नगर परिक्रमा करवाई जाती है। जिसमें माता का छत्र विराजित किया जाता है। जब तक दंतेश्वरी माता दशहरा में शामिल नहीं होती हैं, तब तक यहां दशहरा नहीं मनाया जाता है। माता महा-अष्टमी के दिन दर्शन देने निकलती हैं। बस्तर में मनाए जाने वाला दशहरा पर्व की रस्में 75 दिनों तक चलता है। यह परंपरा करीब 610 साल पुरानी है।

आदिकाल से मां दंतेश्वरी को बस्तर के लोग अपनी कुल देवी के रूप में पूजते हैं। ऐसा माना जाता है कि, बस्तर में होने वाला कोई भी विधान माता की अनुमति के बगैर नहीं किया जाता है। इसके अलावा तेलंगाना के कुछ जिले और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के लोग भी मां दंतेश्वरी को अपनी इष्ट देवी मानते हैं। वहां के लोग भी बताते हैं कि काकतीय राजवंश जब यहां आ रहे थे तब हम कुछ लोग वहां रह गए थे। हम भी मां दंतेश्वरी को अपनी इष्ट देवी के रूप में पूजते हैं।

विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व में शामिल होने हर साल शारदीय नवरात्र की पंचमी पर आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को निमंत्रण देने के लिए बस्तर के राज परिवार के सदस्य मंदिर पहुंचते हैं। इस बार भी पंचमी के दिन राज परिवार ने माता को निमंत्रण दिया है। यह प्रथा सदियों से चली आ रही है। अष्टमी पर माता अपने भक्तों को आशीर्वाद देने मंदिर से निकलेंगी। माता के छत्र और डोली को बस्तर दशहरा में ले जाया जाएगा। इस दौरन जगह-जगह माता की डोली और छत्र का भव्य रूप से स्वागत किया जाता है।

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