लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ीं

नई दिल्ली. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तीन बड़े हिंदी भाषी राज्यों में हार से कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा है. इस हार के बाद पार्टी को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने और सहयोगियों को साथ लेकर चलने का दबाव बढ़ गया है.

हार का आगामी लोकसभा चुनाव पर कितना असर पड़ेगा यह तो वक्त तय करेगा, पर लड़ाई में बने रहने के लिए कांग्रेस को कड़ी मेहनत करनी होगी. क्योंकि, हार से कर्नाटक में जीत का खुमार टूट गया है. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि वह हिंदी भाषी क्षेत्र से लगभग खत्म हो गई है. पार्टी की सिर्फ हिमाचल प्रदेश में सरकार है. वहीं, दक्षिण में कर्नाटक के बाद तेलंगाना में भी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने जा रही है. तेलंगाना की जीत महत्वपूर्ण है,इसका हिंदी भाषी राज्यों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. ऐसे में पार्टी के लिए हिंदी भाषी राज्यों में खुद को विकल्प के तौर पर बनाए रखना चुनौती होगी.

ओबीसी मतदाताओं का भरोसा जीतना होगा इन चुनावों में हार से साफ हो गया है कि कांग्रेस के लिए जाति जनगणना की वकालत कर ओबीसी मतदाताओं को भरोसा जीतना मुश्किल है. क्योंकि, छत्तीसगढ़ में करीब 41 फीसदी ओबीसी मतदाता हैं. पार्टी ने जाति जनगणना कराने का भी वादा किया था, पर ओबीसी मतदाताओं का भरोसा जीतने में विफल रही. मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस ने सरकार आने पर जाति जनगणना का वादा किया था, पर मतदाताओं ने भाजपा पर भरोसा बरकरार रखा. पार्टी के नेता ने कहा कि चुनाव परिणाम की समीक्षा के बाद ही हार के असल कारणों का पता चलेगा. हालांकि, शुरुआती तौर पर ऐसा लगता है कि कांग्रेस का जाति जनगणना का वादा हिंदी भाषी मतदाताओं को पसंद नहीं आया. हमें अपनी चुनाव रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा.

पार्टी को कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाना होगा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत का आगामी लोकसभा चुनाव पर कोई खास असर नहीं पड़ता है. वर्ष 2018 में इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की जीत हुई थी, इसके बावजूद वर्ष 2019 आम चुनाव में भाजपा इन राज्यों की 65 में से 61 सीट पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी.

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